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राहु और पाताल

धारणा



वेद, देवता, अग्नि

शरीर त्याग

राहु आदि की स्थिति
कुछ लोगों का कथन है कि सूर्य से 10000 योजन नीचे राहु नक्षत्र के समान घूमता है इसने भगवान की कृपा से ही देवत्व और ग्राहक प्राप्त किया है स्वयं यह सिंगी का पुत्र असुर धाम होने के कारण किसी प्रकार इस पद के योग्य नहीं है इसके जन्म और कर्मों का हम आगे वर्णन करेंगे।
सूर्य का जो अत्यंत तप्त हुआ मंडल है उसका विस्तार 10000 योजना बतलाया जाता है इसी प्रकार चंद्र मंडल का विस्तार 12000 योजन है और राहु का 13000 अमृत पान के समय राहु देवता के वश में सूर्य और चंद्रमा के बीच में आकर बैठ गया था उसे समय सूर्य और चंद्रमा ने इसका भेद खोल दिया था उसे वीर को याद करके यह अमावस्या और पूर्णिमा के दिन उन पर आक्रमण करता है।
राहु से 10000 योजन नीचे सिद्ध चरण और विद्याधर आदी के स्थान है।
उनके नीचे जहां तक वायु की गति है और बादल दिखाई देते हैं अंतरिक्ष लोक है यह यक्ष राक्षस पिशाच प्रेत और भूतों का बिहार स्थल है।
उससे नीचे सोयोजन की दूरी पर यह पृथ्वी है जहां तक हंस गिद्ध बाज और गरुड़ आदि प्रदान प्रदान पक्षी उड़ सकते हैं वहीं तक इसकी सीमा है।
इसके नीचे भी अत ल वितल सुतल तलाताल महाकाल प्रसादालु और पाताल नाम के साथ भूविवार अर्थात भू घर में स्थित बिल गया लोक है यह एक के नीचे एक 10000 योजन की दूरी पर स्थित है और इनमें से प्रत्येक की लंबाई और चौड़ाई भी 10000 योजन की है यह भूमि के बिल भी एक प्रकार के स्वर्ग ही है इनमें स्वर्ग से भी अधिक विषय को ऐश्वर्या आनंद संतान सुख और धन संपत्ति है यहां के वैभवपूर्ण भवन उद्यान और क्रीडा स्थलों में देखे जाना और नाग तरह की मायावी क्रियाएं करते हुए निवास करते हैं यह सब गरस्थ धर्म का पालन करने वाले हैं उनके स्त्री पुत्र बंधु बांधव और सेवक लोग उनसे बड़ा प्रेम रखते हैं और सदा प्रसन्नचित रहते हैं उनके भोगों में बाधा डालने की इंदिरा आदि में भी समर्थ नहीं है।राहु आदि की स्थिति
देवताओं द्वारा भारतवर्ष की स्तुति@Narayanabank
आधिदेविक स्वरूप
सप्तर्षियों से 13 लाख योजन ऊपर ध्रुव लोक हैं।
इसे भगवान विष्णु का परम पद कहते हैं।
यहां उत्तानपाद के पुत्र परम भगवतभक्त ध्रुव जी विराजमान है ।
अग्नि, इंद्र, प्रजापति कश्यप और धर्म यह सब एक साथ अत्यंत आदरपूर्वक इनकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं।
“संपूर्ण ज्योतिर्गणों के आश्रय कालचक्र स्वरूप सर्व देवाधिपति परमपुरुष परमात्मा का हम नमस्कार पूर्वक ध्यान करते हैं।”
सप्त ऋषि
कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज, इन सात ऋषियों को सप्तर्षि कहा जाता है। हर काल में अलग-अलग सप्तर्षि होते हैं। ये सप्तर्षि मौजूदा काल के हैं। पद्मपुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण समेत कई धर्म ग्रंथों में सप्तर्षियों का उल्लेख मिलता है।
सप्तर्षि तारामंडल पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (हेमीस्फ़ेयर) के आकाश में रात्रि में दिखने वाला एक तारामंडल है। इसे फाल्गुन-चैत महीने से श्रावण-भाद्र महीने तक आकाश में सात तारों के समूह के रूप में देखा जा सकता है। इसमें चार तारे चौकोर तथा तीन तिरछी रेखा में रहते हैं। इन तारों को काल्पनिक रेखाओं से मिलाने पर एक प्रश्न चिन्ह का आकार प्रतीत होता है। इन तारों के नाम प्राचीन काल के सात ऋषियों के नाम पर रखे गए हैं। ये क्रमशः क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरस, वाशिष्ठ तथा मारीचि हैं। इसे एक पतंग का आकार भी माना जा सकता है जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली पंक्ति को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है। दूसरी शताब्दी ईसवी में टॉलमी ने जिन 48 तारामंडलों की सूची बनाई थी यह तारामंडल उनमें भी शामिल था।
अन्य भाषाओं में
अंग्रेज़ी में सप्तर्षि तारामंडल को “अरसा मेजर” (Ursa Major), “ग्रेट बेयर” (Great Bear) या “बिग बेयर” (Big Bear) कहा जाता है – इन सब का अर्थ “बड़ा भालू” होता है। इसे अमेरिका और कनाडा में “बिग डिप्पर” (यानि बड़ा चमचा) भी कहा जाता है। चीन में यह “पे-तेऊ” कहलाता है.
तारे
कुल मिलकर सप्तर्षि तारामंडल में 93 तारों को बायर नाम दिए जा चुके हैं, जिनमें से 13 के इर्द-गिर्द ग़ैर-सौरीय ग्रह परिक्रमा करते हुए पाए गए हैं। इस तारामंडल के सात मुख्य तारे इस प्रकार हैं –
नाम अंग्रेज़ी
नाम बायर नाम चमक
(मैग्नीट्यूड) दूरी
(प्र॰व॰)
क्रतु Dubhe α UMa 1.8 124
पुलह Merak β UMa 2.4 79
पुलस्त्य Phecda γ UMa 2.4 84
अत्रि Megrez δ UMa 3.3 81
अंगिरस Alioth ε UMa 1.8 81
वशिष्ठ Mizar ζ UMa 2.1 78
मारीचि Alkaid η UMa 1.9 101
चक्रण
सप्तऋषि मण्डल ध्रुव तारे के चारों ओर 24 घण्टे में एक चक्कर पूरा करता है। इस मण्डल के प्रथम दो तारे सदैव ध्रुव तारे की सीध में ही दिखाई देते हैं। प्राचीन समय में जब दिशा ज्ञान करने का यंत्र नहीं था , तब ध्रुव तारे की सहायता से ही दिशा का ज्ञान किया जाता था।
धार्मिक ग्रंथों के सप्तर्षि मण्डल
हिन्दू धर्म में विष्णु पुराण के अनुसार, कृतक त्रैलोक्य — भूः, भुवः और स्वः – ये तीनों लोक मिलकर कृतक त्रैलोक्य कहलाते हैं। सप्तर्षि मण्डल शनि मण्डल से एक लाख योजन ऊपर का मण्डल है। सप्तऋषि मण्डल का नाम सात ऋषियों के नाम पर रखा गया है (मरीची, अत्रि, आंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त, वशिष्ठ)।
ध्रुव ध्रुव https://patgendraa.blogspot.com/2021/06/523.html
ग्रह ओर गति

यदि मनुष्य योगी-यति होकर भी अपने हृदय की विषय वासनाओं को उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधको के लिए आप ह्रदय में रहने पर भी वैसे ही दुर्लभ है, जैसे कोई अपने गले में मणि पहने हुए हो, परंतु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूंढता फिरे इधर-उधर।
जो साधक
अपनी इंद्रियोंको तृप्त करने में ही लगे रहते हैं,
विषयों से विरक्त नहीं होते,
उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी दुख-ही-दुख भोगना पड़ता है। क्योंकि
वह साधक नहीं दंभी है।
*एक तो अभी उन्हें मृत्यु से छुटकारा नहीं मिला है, लोगों को रिझाने, धन कमाने आदि क्लेश उठाने पड़ रहे हैं और
*दूसरे आप का स्वरूप न जानने के कारण अपने धर्म कर्म का उल्लंघन करने से परलोक में नरकादि प्राप्त होने का भय भी बना ही रहता है।