यदि मनुष्य योगी-यति होकर भी अपने हृदय की विषय वासनाओं को उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधको के लिए आप ह्रदय में रहने पर भी वैसे ही दुर्लभ है, जैसे कोई अपने गले में मणि पहने हुए हो, परंतु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूंढता फिरे इधर-उधर।

जो साधक
अपनी इंद्रियोंको तृप्त करने में ही लगे रहते हैं,
विषयों से विरक्त नहीं होते,
उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी दुख-ही-दुख भोगना पड़ता है। क्योंकि
वह साधक नहीं दंभी है।
*एक तो अभी उन्हें मृत्यु से छुटकारा नहीं मिला है, लोगों को रिझाने, धन कमाने आदि क्लेश उठाने पड़ रहे हैं और
*दूसरे आप का स्वरूप न जानने के कारण अपने धर्म कर्म का उल्लंघन करने से परलोक में नरकादि प्राप्त होने का भय भी बना ही रहता है।

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