अजामिल 122/1/5

परीक्षित! इसलिए ऐसा समझलो कि बड़े से बड़े पापों का सर्वोत्तम, अंतिम और पाप वासनाओं को भीनिर्मूल कर डालने वाला प्रायश्चित यही है कि केवल भगवान के गुणों,लीलाओं और नामों का कीर्तन किया जाए। इसी से संसार का कल्याण हो सकता है।

जो लोग बार-बार भगवान के उदार और कृपा पूर्ण चरित्रों का श्रवण कीर्तन करते हैं, उनके हृदय में प्रेम मयी भक्ति का उदय हो जाता है।उस भक्ति से जैसी आत्म शुद्धि होती है, वैसी कृछ्र कृछ्र चांद्रायण आदि व्रतों से नहीं होती।जो मनुष्य भगवान श्री कृष्ण चंद्र के चरणारविंद मकरंद रस का लोभी भ्रमर है,वह स्वभाव से ही माया के आपातरम्य  दु:खद और पहले से ही छोड़े हुए विषयों में फिर नहीं रमता।

किंतु जो लोग उस दिव्य रस से विमुख है,कामनाओं ने जिनकी विवेकबुद्धि पर पानी फेर दिया है, वे अपने पापों का मार्जन करने के लिए पुनः प्रायश्चित रूप कर्म ही करते हैं। इससे होता यह है कि उनके कर्मों की वासना मिटती नहीं और वह फिर वैसे ही दोष कर बैठते हैं।